बहराइच में घाघरा कटानरोधी कार्य में अनियमितता का आरोप। जियो बैग में बालू की जगह मिट्टी भरने का दावा
ग्रामीणों ने की जांच की मांग। मानकविहीन कार्य से कटान रोकने की योजना पर उठे सवाल
यूपी के बहराइच जनपद के चौधरी चरण सिंह घाघरा बैराज से सटे मोहरवा गांव में घाघरा नदी के कटान से बचाव के लिए चल रहे सुरक्षा कार्यों पर ग्रामीणों ने गंभीर अनियमितताओं का आरोप लगाया है। ग्रामीणों का कहना है कि चौधरी चरण सिंह घाघरा बैराज से सटे क्षेत्र में लगाए जा रहे जियो बैग निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं भरे जा रहे हैं जिससे कटानरोधी कार्य की गुणवत्ता पर सवाल खड़े हो गए हैं। ग्रामीणों के अनुसार जियो बैग में बालू भरने के बजाय आसपास के क्षेत्रों से खोदी गई मिट्टी का उपयोग किया जा रहा है। उनका आरोप है कि लगभग डेढ़ कुंतल क्षमता वाले जियो बैग में मात्र 20 से 30 किलोग्राम मिट्टी भरकर उन्हें नदी किनारे लगाया जा रहा है। इससे कटानरोधी कार्य की मजबूती प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है।
रविवार को काफी संख्या में कार्यस्थल पर पहुंचे ग्रामीणों का कहना है कि घाघरा नदी के तेज बहाव के दौरान यदि जियो बैग में भरी मिट्टी बह गई तो पूरा सुरक्षा तंत्र कमजोर पड़ सकता है। इससे भविष्य में मोहरवा गांव समेत आसपास के क्षेत्रों को दोबारा कटान की गंभीर समस्या का सामना करना पड़ सकता है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि सरकार द्वारा कटान रोकने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं लेकिन यदि निर्माण कार्य में गुणवत्ता से समझौता किया गया तो इसका उद्देश्य पूरा नहीं हो सकेगा। उन्होंने मांग की कि कार्यस्थल पर उपयोग की जा रही सामग्री की जांच कराई जाए तथा संबंधित विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचकर वास्तविक स्थिति का निरीक्षण करें।
ग्रामीणों ने जिलाधिकारी बहराइच एवं सिंचाई विभाग के उच्चाधिकारियों से मामले की निष्पक्ष जांच कराकर दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कार्रवाई करने तथा मानकों के अनुरूप कार्य सुनिश्चित कराने की मांग की है।
इस दौरान गुलाब चंद्र मौर्य, राजा सिंह, उमाशंकर वर्मा, अभय, आशाराम, दिनेश गुप्ता, राहुल वर्मा, भगवान दास आर्या, देवानंद प्रजापति, मिथुन, दीनानाथ गौतम सहित सैकड़ों ग्रामीण मौजूद रहे।
क्या कहते हैं ग्रामीण
कार्यस्थल पर पहुंचे ग्रामीणों ने मौके पर हो रहे कार्यों की गुणवत्ता पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कटानरोधी कार्य केवल कागजों पर नहीं बल्कि धरातल पर मजबूत होना चाहिए, क्योंकि घाघरा नदी का कटान हर वर्ष गांवों के लिए बड़ी चुनौती बनकर सामने आता है। उनका कहना है कि यदि अभी गुणवत्ता पर ध्यान नहीं दिया गया तो बरसात के दौरान स्थिति गंभीर हो सकती है।
